कहानी कस्तूरी मृग की ..

कहानी कस्तूरी मृग की ..

ORGANIC  Author:Manish Khernar

October 23, 2017

बात एक घने जंगल की है .

वहा एक युवा कस्तूरी मृग रहेता था .

वो कस्तूरी मृग बड़ा दुखी था.

जब से होश संभाला तब से बेचैन. उसे जीवन में कही आनंद नहीं नजर आता . न तो स्वर्ण के गोले जैसे उगते सूर्य में न तो शीतल चांदनी में, न तो नदी के बहेते मीठे पानी में और न ही ठंडी अह्लाद्क पवन में .

न जाने उसे किस चीज की तलाश थी . वो हमेशा किसी चीज को ढूंढता रहता . दिन रात उसे सिर्फ उस चीज की तलाश रहती. उसका मन कही न लगता . जब वो अपने हम उम्र मृगों को आनंद से ज़ूमते देखता तो उसे अपने पर और चिढ आती .

एक दिन उस से रहा नहीं गया. उसने अपना मन बना लिया और अपने परिवार को छोड़ के निकल गया. निकलते वक़्त उसे अपने साथियो पे बड़ी दया आ रही थी , क्योकि वे यह समज नही रहे थे कि मै किसी परम सूख की तलाश में दिव्य यात्रा पे निकल रहा हु , उन सब अज्ञानियो को पीछे छोड़ के .

वो वर्षों तक भटकता रहा पर उसे अपना लक्ष्य नही मिला और नहीं लक्ष्य का कोई हलकासा निशान या दिशानिर्देश भी मिला . उसका जीवन से विश्वास उठ सा गया...

थक कर उसने अपना जीवन समाप्त करने का निश्चय कर लिया .

वही उसे एक कुआ दिखा , उसने उसमे कूद कर जान दे देने का फैसला किया. इस मिथ्या जीवन को अलविदा कह कर वो उस कुए के निकट जा खड़ा हुआ और कुए में कूदने का सामर्थ्य जुटाने लगा

तभी वहा पास वाली ज़ोपड़ी में से एक साधू बहार आया .

वो आश्चर्य में पड़ा ये देख कर कि एक सुन्दर और दुर्लभ कस्तूरी मृग कुए के पास क्या कर रहा है . उसने सोचा उसे शायद प्यास लगी होगी . तो कुए के पास जा कर मृग के लिए पानी निकलने लगा.

तभी मृग बोला, “नही बाबा मुझे पानी नही चाहिए, मुझे इस कुए में कूद कर मर जाना है . मै तंग आ गया हु इस जीवन से. मुझे मेरे प्रश्न के जवाब शायद इस जीवन में कभी नही मिलेंगे . मेरी तलाश का अंत शायद मेरी मृत्यु ही है.”

साधू बड़ा हैरान हुआ. उसने कहा, “तुम कितने सुन्दर हो युवा भी हो और स्वस्थ भी लग रहे हो ऐसी कौनसी समस्या तुम्हे सता रही है जो तुम इतने परेशान हो ?”

मृग की आख में आसू आ गए , वो बोला “बाबा जब से होश संभाला तब से एक अजीब सी सुगंध मुझे पुकार रही है , मुझे अपनी तरफ आकर्षित कर रही है , मुझे उसके पास जाना है , उसे पकड़ना है उसे अपना बनाना है ..पर क्या करू सालों से भटक रहा हु उसकी तलाश में पता नहीं क्यों मेरे पीछे पड़ी है ना मुझे मिलती है और ना ही मेरा पीछा छोड़ती है ! में तंग आ गया हु और अब मै इस तड़प से मुक्ति पाना चाहता हु”

उसका ये जवाब सुन कर साधू को हसी आ गयी , उसने बड़े प्यार से मृग को कहा, “तुम एक दम सही जगह पर आये हो , पर गलत धारणा से आये हो , तुम्हे तुम्हारा जवाब इस कुए की गहराई में अवश्य मिलेगा पर उसमे कूदने से नहीं सिर्फ उसमे अपना प्रतिबिम्ब देखने से . जो खुशबु तुम्हे अपने पास बुला रही है वो और किसी चीज की नहीं अपितु तुम्हारी स्वयं की ही है ..उसे जितना बहार ढूंढोगे उतने ही मानसिक रूप से अस्वस्थ होते जाओगे . तुम्हारा जवाब तुम्हारे भीतर ही है . उसे अपने भीतर खोजो. और इस से ज्यादा जरुरी है पहेले आती हुई सुगंध का आनंद तो लो !”

हम सब की कहानी भी कुछ कुछ इस मृग जैसी ही है . हमारा आनंद हम दुनिया भर में आजीवन खोजते रहेंगे पर कभी भी अपने अन्दर नहीं खोजेंगे . कभी भी रुक कर उस आनंद की अनुभूति तक नहीं करेंगे . हम स्वाभाविक रूप से ही आनंदित है , अगर हमारा आनंद कही खो गया हो तो असल में वो खोया नहीं है , हमारा उस से संबध तूट गया है , हम उस सम्बन्ध को जोड़ने के बदले उस आनंद को पैसे में, सत्ता में, सेक्स में , संन्यास में , जंगलो में , पर्वतो पर और न जाने कहा कहा खोजते रहेते है . क्यों न एक पल ठहर कर उस आनंद से संबध पुन: जोड़ने की कोशिश करके देखे ...

अपने ही अन्दर गहराई में उतर कर,

अपने ही अन्तर मन के गहरे तालो में झांक कर  .....

उमर खैयाम ने कितना सही कहा है ...

                         “हम जिसको ढूंढते है , ज़माने में उम्र भर

                                   वो ज़िन्दगी तो अपने ही अन्दर का खेल है“


With Love for all the Swa-Darshaks !